Saturday, June 30, 2012

कितनी बेहतर थी....

तुमने दूर जाकर ये कैसा सितम ढाया मुझपर
तुम्हारी खिच खिच की तासीर,  कितनी बेहतर थी
मैं परेशान तुम हैरान, रिश्ता फिर भी जिंदा था
साथ रहकर ज़िन्दगी की तदबीर, कितनी बेहतर थी

सोचा न था फिसल जाओगे, रेत की तरहा मेरे हाथों से
सोचा न था, यूँ दूर निकल जाओगे, दूसरी राहों से
जो बुनते थे ख्वाबों के आशियाने कितने कीमती थे
जो बनाते थे हवाओं में तस्वीर, कितनी बेहतर थी

अब यह खुली हवाएं रास नहीं आती मुझको
अब यह रंग बिरंगी फ़िजाएँ रास नहीं आती मुझको
रात भर गूंजते ये सन्नाटे कितने बदतर हैं 
तेरे बंधन, तेरी गिरफ्त, वो ज़ंजीर, कितनी बेहतर थी

Sunday, June 17, 2012

क्यूँ कर है ऐसी जुस्तजू

क्यूँ कर है ऐसी जुस्तजू
जिस पर खुद मैं भी हैरान हूँ
कहते हैं की कहते क्यूँ नहीं
सोचता हूँ की कहूं तो कैसे कहूं

वो दूर दूर से ताकना कब तलक
वो झूटे भरम का रखना कब तलक
तोड़ के ये डोर, उड़ती पतंग सा फिरूं
या वही ख़ामोशी, ओड़ कर चुप ही रहूँ

जो कर दी बयां, वो चाहत कैसी
जो हो गयी अयाँ, वो इबादत कैसी
छुपा कर भी रखूँ तो क्यूँ रखूँ
चिल्ला कर भी कह दूं तो क्यूँ कहूं



   

अधूरी तस्वीर...

जो तेरे साथ रह कर न बनी, वो तस्वीर आज तक अधूरी है
जो थी दरमियान हमारे, बरकरार आज तक वो दूरी है
खींच कर ले आई ज़िन्दगी दूर तुझसे, बा-हयात
उस वक़्त वो जिद थी मेरी, और आज फ़क़त मजबूरी है

अब अश्क बहते नहीं हैं, जम से जाते हैं
लम्हें भी चलते नहीं, बस थम से जाते हैं
सुर्खियाँ चेहरे पर, अब स्याह सुफेद पड़ गयी हैं
गुज़रे वक़्त की शिनाख्त, क्यूँ लाजिमी, क्यूँ ज़रूरी है ...